कभी
एक पर्वत थी जिदंगी
सूनी-अकेली-अबोली-सी,
किसी ने छुआ फूल बन गई,
किसी ने झटक दिया
पाँखुरी-सी बिखर गई।
तब जाना:
न कभी वह फूल थी,
न राई-पर्वत,
एक खिलौना भर थी
टूट बिखर कर
होती रही आहत।
कोई और जिदंगी
पास आई तो
वह प्रभावित हुई
और किसी बिछोह के साथ
रह गई छुईमुई।
- डॉ. तारादत्त निर्विरोध
बेहतरीन! बधाई!
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