Saturday, September 26, 2009

एक दिन मैंने लिया था
काल से कुछ श्वास का ऋण,
आज भी उसको चुकाता,
ले रहा वह क्रूर गिन गिन;
ब्याज में मुझसे उगाहा
है ह्रदय का गान उसने,
किन्तु होने में उऋण
अब शेष केवल और दो दिन;
गिर पडूंगा तान चादर
सर्वथा निश्चिंत होकर,
भूलकर जग ने किया
किस-किस तरह
अपमान मेरा|

Thursday, September 10, 2009

Bhor

Bhor bhor bhor bhai ek udta panchi
Ja baitha ek daal, ja baitha ek dal
Khusboo daal ki manhar le, gayee manhar le gayee
Khusboo daal ki manhar le gayee gajab tha rang jama


Saans saans chadhe ishq ka jadoo, ishq ka jadoo
Saans saans chadhe ishq ka jadoo reh reh kare kamal

Saans saans chadhe ishq ka jadoo reh reh kare kamal
Are Saans saans chadhe ishq ka jadoo reh reh kare kamal
Saans saans chadhe ishq ka jadoo reh reh kare kamal

Kaun ghadi mein..

Are chuni daal thi
chuni daal thi
chuni daal thi

Kaun ghadi mein chuni daal thi, chuni daal thi
koshe sudh budh har

Bhor bhor bhor bhai ek udta panchi
Ja baitha ek daal, ja baitha ek dal
Bhor bhor bhor bhai ek udta panchi
Ja baitha ek daal, ja baitha ek dal

Panchhi kahe kis gagan udu mein, gagan udu mein

gagan udu, gagan usu, kis gagan udu mein

Panchhi kahe kis gagan udu mein behtar jo is daal
Panchhi kahe kis gagan udu mein behtar jo is daal

Pankh sunehriii...

Sehad chadh gaya
Sehad chadh gaya
Sehad chadh gaya

Pankh sunehri sehad chadh gaya
Pankh sunehri sehad chadh gaya
Pankh sunehri sehad chadh gaya

Antar tham gayee chal

Bhor bhor bhor bhai ek udta panchi
Ja baitha ek daal, ja baitha ek dal
Bhor bhor bhor bhai ek udta panchi
Ja baitha ek daal, ja baitha ek dal

Qatal bhi aisa hua ke panchhi marke malamal
Qatal bhi aisa hua ke panchhi marke malamal
Malamal hua aisa qatal bhi hua
Qatal bhi aisa hua ke panchhi marke malamal
Katra katra aasman hai bujhi asal udan

Bhor bhor bhor bhor....
Bhor bhor bhor bhor....
Bhor bhor bhor bhor....
Bhor bhor bhor bhor....

Saturday, August 29, 2009

अर्जियां

टूट के बिखरना मुझको ज़रूर आता है
हो.. टूट के बिखरना मुझको ज़रूर आता है
वरना इबादत वाला सहूर आता है
सजदे में रहने दो
अब कहीं न जाऊंगा
सजदे में रहने दो
अब कहीं न जाऊंगा
अब जो तुमने ठुकराया तो संवर न पाउँगा

मौला मौला मौला मेरे मौला
मौला मौला मौला मौला
मौला मौला मौला मौला

दरारें दरारें बंधे पे मौला
मरम्मत मुक़द्दर की कर दो मौला

गुलज़ार

Thursday, August 13, 2009

रोशनी

सुबह, दोपहर, शाम
कभी नहीं आराम
आपाधापी में काम और काम
थक जाता है तन
मुंद जाती है ऑंखें
पर कदम तो बढ़ाने ही होते हैं
थकते नहीं तो कभी टे्रन, बस, ट्राम
हमें उन तक पहुंचना होता है
ऐसे में कभी-कभी
भरी दुपहरी में
छा जाता है अंधेरा ऑंखों पर
नहीं...नहीं ऑंखें देख नहीं पातीं
बाहर कुछ भी
अंधेरा जो घुस गया होता है भीतर...
तभी किसी सुरमई ऑंखों की चमक
काले बादलों को चीरती है
भीतर, बाहर
...तब रोशनी का जन्म होता है!

- डॉ. दामोदर खड़स

Wednesday, August 12, 2009

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या।


जिस दिन मेरी चेतना जगी मैनें देखा,
मैं खडा हुआ हूं दुनिया के इस मेले में,
हर एक यहां पर एक भुलाने में भूला,
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में,
कुछ देर रहा हक्क-बक्क, भौंचक्का सा,
आ गया कंहा, क्या करुं यहां, जाऊं किस जगह?
फ़िर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा,
मैनें भी बहना शुरु किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का उहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या।


मेला जितना भडकीला रंग-रंगीला था,
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज़ ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊं,
क्या मान अकिंचन पथ पर बिखरता आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला मुझको
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आंसू, वह मोती निकला
जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या।


मैं कितना ही भूलूं, भटकूं या भरमाऊं,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पांव पडे, ऊंचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत सी बातों का,
पर मैं क्रितग्य उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहां खडा था कल, उस थल पर आज नही,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं,
वे छू कर ही काल-देश की सीमाएं,
जग दे मुझ पर फ़ैसला जैसा उसे भाए,
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के,
इस एक और पहलू से होकर निकल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या।


हरिवंशराय बच्चन

Friday, July 31, 2009

भ्रम

दिन भर एक कोलाहल के साध
उस हँसी के ठहाकों के बीच
जिन्दा रहने की वो जुजुत्सा
सामान्य दिखने का वो सफल प्रयास
दम तोड़ देता है
रात की आहट पर
जब घेरता है
वही कुहाँसा घनघोर अन्धेरा
और गिर पड़ती है
पानी की दो बूँदें
मेरे ही गालों पर
हमेशा की तरह ...

- आरिफ़ ख़ान

* * *

ईंधन

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

- गुलज़ार

Wednesday, July 29, 2009

छूयीमूयी

कभीएक पर्वत थी जिदंगी
सूनी-अकेली-अबोली-सी,

किसी ने छुआ फूल बन गई,
किसी ने झटक दिया
पाँखुरी-सी बिखर गई।
तब जाना:
कभी वह फूल थी,
राई-पर्वत,
एक खिलौना भर थी
टूट बिखर कर
होती रही आहत।
कोई और जिदंगी
पास आई तो
वह प्रभावित हुई
और किसी बिछोह के साथ
रह गई छुईमुई।

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध