कभी नहीं आराम
आपाधापी में काम और काम
थक जाता है तन
मुंद जाती है ऑंखें
पर कदम तो बढ़ाने ही होते हैं
थकते नहीं तो कभी टे्रन, बस, ट्राम
हमें उन तक पहुंचना होता है
ऐसे में कभी-कभी
भरी दुपहरी में
छा जाता है अंधेरा ऑंखों पर
नहीं...नहीं ऑंखें देख नहीं पातीं
बाहर कुछ भी
अंधेरा जो घुस गया होता है भीतर...
तभी किसी सुरमई ऑंखों की चमक
काले बादलों को चीरती है
भीतर, बाहर
...तब रोशनी का जन्म होता है!
- डॉ. दामोदर खड़स
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